Jannatul Baqi Map

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Thursday, 13 June 2019

Demolition of Jannatul Baqee.pdf

Jannatul Baqi
A Symbol of Continued Oppression
Jannatul Baqi is a much-esteemed graveyard located in Al-Madinah al Munawwarah in Saudi Arabia. Many of the great companions of the Messenger (s.a.w.a.) and immaculate members of his (s.a.w.a.) household including his (s.a.w.a.) successors are laid to rest here.

Download the File :

https://drive.google.com/file/d/1T7ACPluMFEp_C-JujoeHGetye2Fe589V/view?usp=sharing


Monday, 23 February 2015

The Shared History of Saudi Arabia and ISIS

The Saudi regime has imprisoned its moderate Islamists and allowed its radicals to cause mayhem in the Levant. It is uncertain whether those radicals are indirectly or directly sponsored by the Saudi regime. But it is certain that the regime shares their hatred of Shia Muslims, the Assad and Maliki regimes, Lebanon’s Hezbollah and Iran. While the Saudi regime cannot realistically bomb its rivals, jihadis are performing the role with precision.
A recent report argues that ISIS or the ‘Islamic State’ is largely a self-funded movement, drawing on a wide range of sources. The Saudi regime is not one of them. The report debunks ex-Iraqi Prime Minister Nuri al-Maliki’s accusations that his country faces the threat of terrorists funded directly by Saudi Arabia. Yet the prominence of Saudis in its rank and file is yet to be explained. Notwithstanding the Saudi offensive to absolve itself from any connection with Islamic State, these groups have demonstrated a certain affinity not only with the Saudi religious tradition but also its political history.
From Beirut to Baghdad, Saudi radicals who have joined ISIS and other similar militia are determined to eliminate their rivals and enemies, and finally establish their dream Islamic state. Evidently those Saudi jihadis now fighting for Islamic State are not satisfied with their own allegedly Islamic state, known as the Kingdom of Saudi Arabia. They are the generation of the 1990s—young, connected, unruly and full of zeal in support of an Ummah, narrowly defined as a Sunni community that excludes all others in the world of Islam. This is not surprising: they have grown up in Saudi Arabia, whose Wahhabi form of Islam crushes religious diversity.
Yet the exodus of young Saudis to neighbouring Arab countries must not be seen through a purely religious lens. Above all, it is a product of Saudi policies that use religion in the service of the state. The Saudi state itself was produced by an earlier version of the conflicts we are witnessing today in the Levant. As early as 1912 the founder of the Saudi kingdom, Ibn Saud, created tribal militia called the Ikhwan and indoctrinated its fighters in the art of killing Muslims who objected to his own political authority on the ground that they were kafir—infidels. He enlisted the tribal youth of the Arabian Peninsula in a jihad against all those who resisted his hegemony. His first state was called Dawlat Najd and Hijaz, as it incorporated Central Arabia and the Western province where the holy cities of Mecca and Madina are located. The founder assumed several titles, including Emir, Imam and Sultan, before he settled on the title of King, at the suggestion of the British colonial power.
The creation of modern Saudi Arabia is unique in the Arab world as it was a jihadi project from the very beginning. Unlike in other Arab states where the youth are introduced to a mythologized nationalist narrative about history, Saudi youth are indoctrinated into the unique jihadi narrative of the state as one that came into being as a result of the efforts of a pious leader who energised his people, saved them from blasphemy and eradicated un-Islamic beliefs and practices.
The Saudi fighters of the twenties had a special dislike for statues and graves. They arrived in Mecca and Medina in the mid-1920s and immediately went on a rampage, searching for signs of blasphemy. They destroyed graves and imposed on the population strict codes of conduct. No woman was to be seen in the streets and no tobacco was to be consumed in public. They immediately marked the beginning of their rule by implementing a series of measures, from rounding people up to perform prayers to monitoring public morality.

Wednesday, 6 November 2013

अरब में नष्ट होती प्राचीन इस्लामी धरोहरें




इस्लाम धर्म के प्रवर्तक पैग़ंबर हज़रत मोहम्मद का जन्म अरब की सरज़मीन पर हुआ तथा यहीं रहकर उन्होंने इस्लाम धर्म का ज्ञान तथा शिक्षा का प्रचार व प्रसार शुरु किया। इस्लाम से जुड़ी कुछ ज़रूरी हिदायतें जैसे कि नमाज़, रोज़ा, हज,ज़कात इत्यादि की शुरुआत भी इसी मक्का व मदीना जैसे सऊदी अरब के पवित्र व ऐतिहासिक शहरों से की गई। हज़रत मोहम्मद का अपना परिवार भी अधिकांश तौर पर इन्हीं शहरों में रहा करता था। ज़ाहिर है चंूकि हज़रत मोहम्मद को इस्लाम धर्म के लोग अपना आखरी पैग़ंबर व इस्लाम का संस्थापक स्वीकार करते हैं।
अत: हज़रत मोहम्मद के साथ-साथ उनके परिवार के सदस्यों व उनसे जुड़ी सभी यादगार चीज़ों जैसे उनके प्राचीन भवन, प्राचीन यादगार मस्जिदें, बगीचे, उनके उठने-बैठने, इस्लामी शिक्षा देने वाले व संपर्क में आने वाले तमाम ऐतिहासिक स्थल, उनसे संबंधिततमाम वस्तुएं आदि इस्लाम धर्म के मानने वालों के लिए दर्शनीय होती हैं। और आस्था की भावनाओं में डूबा हुआ कोई भी व्यक्ति ऐसी यादगार वस्तुओं व स्थलों को न केवल देखना चाहता है बल्कि उन्हें देखकर वह चूमने की कोशिश करता है, इन्हें छूना चाहता है तथा इन ऐतिहासिक वस्तुओं व स्थलों को अपने हाथों,चेहरे व शरीर के संपर्क में लाना चाहता है। और यही इस्लाम धर्म एक सर्वशक्तिमान अल्लाह के अतिरिक्त किसी दूसरे के समक्ष नतमस्तक होने की मनाही भी करता है।
पूरा इस्लामी जगत इस अति विवादित व संवेदनशील मुद्दे को लेकर दो भागों में विभाजित है। इसमें एक को हम वहाबी विचारधारा के नाम से जानते हैं। विशेषकर सऊदी अरब का शासक परिवार इसी वहाबी विचारधारा का अनुयायी है। यह विचारधारा पूरी सख्ती के साथ रूढ़ीवादी इस्लामी शिक्षाओं का पालन करने का संदेश देती है व पूरे मुस्लिम जगत से भी इसका पालन करने की उम्मीद करती है। खासतौर पर इस विषय पर कि इस्लाम के मानने वाले लोग अल्लाह के सिवा किसी अन्य के आगे न तो झुकें, न सजदा करें, न उसे चूमने या छूने की कोशिश करें।और जहां तक संभव है वहाबी विचारधारा के यह सऊदी शासक अपनी इस विचारधारा पर अमल करने व कराने तथा इनके लिए रास्ता हमवार करने की पूरी कोशिश भी करते हैं। इस वहाबी वर्ग को इस्लामी जगत में रूढ़ीवादी व कट्टरपंथी इस्लामी विचारधारा के रूप में देखा व समझा जाता है। इस्लाम में 73 समुदाय हैं। वहाबी के अतिरिक्त शेष 72 समुदाय जिनमें बरेलवी, शिया, हनफी, सूफी, अहमदिया, ख़ोजा, बोहरा जैसे अन्य समुदाय मुख्यतय: शामिल हैं। यह सभी समुदाय भी वहाबियों की तरह एक अल्लाह को ही सर्वोच्च व सर्वशक्तिमान मानते हैं। इसके अतिरिक्त यह सभी समुदाय कुरान, रोज़ा-नमाज़, हज-ज़कात आदि को भी मानते हैं तथा इनपर अमल करते हैं। हां इनके अमल करने के तौर-तरी$कों में ज़रूर कुछ $फकऱ् है। परंतु अल्लाह को तो सभी 73 वर्गों के लोग सर्वोच्च ही मानते हैं। इन 72 वर्गों के अनुयायी अल्लाह के बाद अपने रसूल, खलीफाओं,इमामों, उनके परिवार के लोगों,उनसे जुड़े यादगार स्थलों, उनकी प्राचीन इबादतगाहों व रिहायशी स्थानों जैसी सभी चीज़ों से अपना हार्दिक व भावनात्मक संबंध भी रखते हैं।और यही भावनात्मक लगाव आस्था का रूप धारण कर लेता है। परिणामस्वरूप इनसे लगाव रखने वाला कोई भी व्यक्ति उन्हें चूमना, देखना तथा प्राय: उसके आगे श्रद्धापूर्वक नतमस्तक भी होना चाहता है। उदाहरण के तौर पर इराक,ईरान, पाकिस्तान, भारत, अफगानिस्तान, तुर्की,सीरिया, जॉर्डन, फलीस्तीन जैसे और कई देशों में इस्लाम से जुड़ी ऐसी तमाम ऐतिहासिक धरोहरें हैं जिनका संबंध इस्लामी जगत के प्रमुख इमामों, संतों, फकीरों, खलीफाओं आदि से है।
पूरी दुनिया का मुसलमान ऐसी जगहों पर आता-जाता रहता है तथा अपनी श्रद्धा व आस्था के अनुसार इन जगहों पर नतमस्तक होता है मन्नतें व मुरादें मांगता है तथा अपनी श्रद्धा के पुष्प अर्पित करता है। ऐसा करने वाले समुदायों के लोग अपनी इन गतिविधियों को इस्लामी गतिविधियों का ही एक हिस्सा मानते हैं तथा ऐसा करना उनकी नज़रों में पूरी तरह इस्लामी कृत्य स्वीकार किया जाता है। जबकि ठीक इसके विपरीत वहाबी विचारधारा अल्लाह को सजदे यानी नमाज़ पढऩे के सिवा किसी भी अन्य स्थल, दरगाह, रौज़ा,मक़बरा या इमामबारगाहों आदि में चलने वाली गतिविधियों जैसे मजलिस,ताजि़यादारी,नोहा, मातम, कव्वाली, नात आदि चीज़ों को गैर इस्लामी मानते हैं तथा इसे शिर्क(अल्लाह के साथ किसी अन्य को शरीक करना)की संज्ञा देते हैं। दुनिया के अन्य देशों में वहाबी विचारधारा का प्रशासनिक मामलों में उतना प्रभाव नहीं जितना कि सऊदी अरब में है क्योंकि कट्टरपंथी वहाबी विचारधारा का जन्म ही सऊदी अरब में हुआ।यही वजह है कि सऊदी शासक से लेकर वहां के अमीर लोग, अधिकांश प्रशासनिक अधिकारी, औद्योगिक घराने,उच्च व्यवसाय से जुड़े लोग आमतौर पर वहाबी विचारधारा के मानने वाले हैं। लिहाज़ा सऊदी अरब में इस विचारधारा के लोग अपनी मजऱ्ी के मुताबिक़ जब और जिस बहाने से चाहते हैं प्राचीन इस्लामिक धरोहरों को नष्ट करने से बाज़ नहीं आते। पूरा विश्व का प्रत्येक धर्म व समुदाय जहां अपनी प्राचीन यादगार ऐतिहासिक धरोहरों को संभालने तथा इन्हें सुरक्षित रखने पर ज़ोर देता है वहीं सऊदी अरब के वहाबी शासकों द्वारा गत् बीस वर्षों के भीतर इस्लाम, हज़रत मोहम्मद व उनके परिवार के सदस्यों से जुड़ी तकऱीबन 95 प्रतिशत यादगारों को ध्वस्त किया जा चुका है।
हालांकि दुनिया को दिखाने के लिए यह सऊदी शासक अपने मुख्य एजेंडे को ज़ाहिर नहीं करते और इन ऐतिहासिक स्थलों को गिराने के लिए हज यात्रियों को दी जाने वाली सुविधाओं तथा दुनिया के मेहमानों के लिए व्यवस्था किए जाने की बात करते हैं। परंतु हकीकत में इनका गुप्त एजेंडा यही रहता है कि हज़रत मोहम्मद व उनके परिवार से संबंधित मकानों, मस्जिदों तथा अन्य यादगार स्थलों को केवल इसलिए मिटा दिया जाए ताकि वहां जाकर दुनिया के लोग नतमस्तक न हों, उन जगहों पर सजदा न करें व उन स्थानों को चूमें नहीं तथा इन ऐतिहासिक पवित्र स्थलों से अपने भावनात्मक लगाव का इज़हार न कर सकें। गोया वहाबियत अपनी धार्मिक रूढ़ीवादिता व पूर्वाग्रह के अनुसार ही दुनिया के अन्य मुसलमानों से भी अनुसरण कराना चाहती है।
सऊदी अरब विशेषकर मक्का व मदीना के हज सथल के चारों ओर होने वाली तोडफ़ोड का एक और कारण यह भी है कि वहाबी शाही घरानों से संबंधित तमाम लोग हज स्थल के चारों ओर गगनचुंबी इमारतें, पांचसितारा लग्ज़री होटल, शॉपिंग कॉम्पलेक्स आदि का निर्माण करा रहे हैं। यह सब भी हज यात्रियों की सुविधाओं तथा विदेशी पर्यटकों की मेहमानवाज़ी के नाम पर किया जा रहा है। परंतु इस विकास की बुनियाद में उन ऐतिहासिक धरोहरों को दफन किया जा रहा है जो सीधे तौर पर हज़रत मोहम्मद व उनके परिवार के लोगों से जुड़ी हैं तथा जिन्हें दुनिया का मुसलमान सऊदी अरब में हज के दौरान आने पर ढूंढना व देखना चाहता है। हालंाकि इन ऐतिहासिक धरोहरों को ध्वस्त करने का काम कोई नया नहीं है। पवित्र काबा का पुनर्निमार्ण, अब्दुल्ला बिन ज़ुबैर व मक्का के गवर्नर रहे हजाज बिन युसुफ के समय में प्राचीन भवन को तोडक़र किया गया। उसके पश्चात खलीफा अब्दुल मलिक बिन मरवान के निर्देशों पर पुन: कई यादगार धरोहरों को तोड़ दिया गया। उमर बिन क़त्ताब के समय में हज़रत मोहम्मद की मुख्य मस्जिद तोड़ी गई तथा इसे पुन: निर्मित किया गया। और इस प्रकार ऐतिहासिक यादगार धरोहरों को समाप्त किए जाने का सिलसिला आज तक जारी है। हद तो यह है कि अरब के इन शासकों ने हज़रत मोहम्मद की पत्नी हज़रत ख़दीजा का भी घर बुलडोज़रों से गिरवा दिया तथा उस स्थान पर सार्वजनिक शौचालय बनवा दिया गया। हज़रत मोहम्मद द्वारा अपनी बेटी फातिमा को दहेज में दिया गया बग़ीचा जिसे बाग-ए-फदक के नाम से जाना जाता था उसे भी कई वर्ष पूर्व ढहाया जा चुका है तथा इस पर भी इमारतें बनाई जा चुकी हैं।
सवाल यह है कि ईश निंदा कानून के समर्थक, आपे्रशन लाल मस्जिद के विरोधी , सलमान रुश्दी के विरुद्ध फतवा जारी करने वाले, डेनमार्क में हज़रत मोहम्मद का कार्टून प्रकाशित करने वाले अखबार का विरोध करने वाले,समय-समय पर इस्लाम विरोधी शक्तियों के विरुद्ध अपनी आवाज़ उठाने वाले तथा बाबरी मस्जिद विध्वंस का विरोध करने वाले इस्लामी जगत के लोग इस्लाम संबंधित बुनियादी व यादगार ऐतिहासिक धरोहरों की रक्षा करने के लिए मिलकर आवाज़ें क्यों नहीं उठाते? हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वहाबी विचारधारा सऊदी अरब में शासन में होने के चलते विकास व हजयात्री सुविधाओं के नाम पर अपने एजेंडे को लागू करती रहती है।परंतु यही विचारधारा जब अरब से बाहर निकलती है तो अफगानिस्तान के बामियान में तोपों से शांतिदूत महात्मा बुद्ध की मूर्तियां तोड़ती नज़र आती है तथा पाकिस्तान में यही विचारधारा इमामबाड़ों, दरगाहों, धार्मिक जुलूसों व मस्जिदों में आत्मघाती हमले कराती तथा बेगुनाह लोागों की हत्याएं करती नज़र आती है। पूरी दुनिया के मुसलमानों को इस विचारधारा के विरुद्ध संगठित होने की ज़रूरत है। अन्यथा अरब में नष्ट होती प्राचीन इस्लामिक धरोहरों की ही तरह यह विचारधारा कहीं इस्लाम धर्म के अस्तित्व के लिए भी घातक न साबित हो।
तनवीर जाफरी

सऊदी सरकार और वहाबी कठ्मुल्लाओं के हाथों इस्लामी धरोहरों की तबाही ( जन्नतुल बक़ी )

इतिहास केवल इतिहास की पुस्तकों  तक सीमित नहीं है बल्कि इसको किसी भी देश की एतिहासिक इमारतों और स्थानों पर भी देखा जा सकता है। इमारतें , प्राचीन क़ब्रिस्तान, हज़ारों वर्ष पुराने गुंबद और स्तंभ भी लिखित इतिहास की भांति महत्वपूर्ण हैं बल्कि इनका महत्व पुस्तकों से भी अधिक है। कुछ समय से सऊदी अरब में इस्लाम का जीवित व सदृश्य इतिहास जो ईश्वरीय धर्म इस्लाम की महा सांस्कृतिक धरोहर समझा जाता है, बर्बाद हो रहा है और सऊदी सरकार तथा वहाबी कठमुल्ला, मुसलमानों की इन एहतिहासिक धरोहरों को मिटा रही हैं। बहुत से लोगों का मानना है कि सऊदी अरब के अधिकारी मक्के और मदीने में तीर्थयात्रियों की गुंजाइश बढ़ाने के उद्देश्य से मस्जिदुन्नबी और मस्जिदुल हराम को बढ़ा रहे है लेकिन इसमें वह इस बात का ध्यान नही रख रहें है कि एतिहासिक मह्तव वाले स्थानों को सही रखा जाए। लेबनान के दावते इस्लामी कालेज के प्रमुख शैख़ अब्दुन्नासिर अलजबरी ने इस संबंध में अलआलम टीवी चैनल से बात करते हुए कहा कि जब हम पवित्र नगर मदीने में पैग़म्बरे इस्लाम (स) के रौज़े का दर्शन करते हैं तो हम देखते हैं कि खोखले कार्टूनों की भांति लंबी लंबी इमारतों से रौज़े को घेर दिया गया है और अपार अध्यात्मिक गुणों से संपन्न उन पवित्र स्थलों के अस्तित्व को मिटा दिया गया है जिनके माध्यम से हम पैग़म्बरे इस्लाम (स) के पवित्र चरित्र और व्यवहार तथा पवित्र क़ुरआन की आयतों को प्राप्त कर सकते हैं।
 वहाबी आस्था रखने वाली सऊदी अरब की सरकार अपने गठन के आरंभ से ही विभिन्न बहानों से धार्मिक स्थलों की पवित्रता की अनदेखी करती आ रही है। बहाबियों ने धर्म में नयी बातों के प्रविष्ट होने और अंधविश्वास से संघर्ष के बहाने अब तक पवित्र नगर मक्के और मदीने नगर में बहुत सी ऐतिहासिक और धार्मिक धरोहरों को बर्बाद किया है। इस्लामी धरोहरों के विशेषज्ञ सामी ओजावी का मानना है कि कुछ समय बाद मक्के में प्राचीन इतिहास का कोई भी धरोहर दिखाई नहीं पड़ेगी। हालिया 50 वर्षो के दौरान मक्के और मदीने में वहाबी कठ्मुल्लाओं द्वारा 300 से अधिक धार्मिक और ऐतिहासिक इमारतों को ध्वस्त किया जा चुका है। इन धरोहरों को बर्बाद करने वाले पैग़म्बरे इस्लाम सलल्लाहो अलैह व आलेही वसल्लम से संबंधित धरोहरों को मिटाने में भीसंकोच नहीं करते। धर्मभ्रष्ट वहाबी कठ्मुल्लाओं का मानना है कि यदि यह इमारतें बाक़ी रहीं तो संभव है कि दूसरे देशों के मुसलमानों द्वारा इनका सम्मान किया जाने लगे और यह कार्य उनकी दृष्टि में मूर्तिपूजा और ईश्वर के अतिरिक्ति किसी और की उपासना करने के समान है। जबकि यह केवल एक धर्मोंमादी गुट अर्थात वहाबियों की आस्था है और मुसलमान अपना यह दायित्व समझते हैं कि वह अपने प्यारे पैग़म्बर और अन्य हस्तियों का जिन्होंने इस्लाम धर्म को आगे बढ़ाने और स्थापित करने के लिए बहुत कठिनाईयां सहन कीं और अध्यात्म के श्रेष्ठ स्थानों पर हैं, सम्मान करें। सऊद परिवार की सरकार ने जहां भी पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम और उनके प्रिय परिजनों और उनके साथियों से संबंधित कोई भी ऐतिहासिक धरोहर बच गये और वह घर जो पैग़म्बरे इस्लाम और उनके प्रिय परिजनों के साधारण और अध्यात्म से पूर्ण जीवन की निशानी थे, सभी को अतार्किक और निराधार बहानों से ध्वस्त कर दिया।
 शिया और सुन्नी दोनों ही समुदायों ने बहुत से इस्लामी इतिहासों का हवाला दिया है जिनके आधार पर ईश्वर के पवित्र घर काबे के सम्मान और उसके वैभव की सुरक्षा के लिए मस्जिदुल हराम के आस पास उससे ऊंची इमारतों का निर्माण सही नही है। कुछ वर्षों पूर्व तक मस्जिदुल हराम के प्रांगड़ से मिली हुई बड़ी इमारत सऊदी अरब के पूर्व नरेश मलिक फ़हद का महल था किन्तु हालिया दिनों में सऊदी परिवार ने और भी लंबा पैर फैला दिया है और वह मस्जिदुल हराम के निकट घंटाघर या क्लाक टावर के नाम से सबसे ऊंची इमारत का उद्धाटन करने वाले हैं। इस टावर के ऊपरी भाग में घड़ी लगी होगी और छोटे छोटे टावर उसके इर्द गिर्द बने होंगे। 11 जनवरी वर्ष 2012 को इसका उद्घाटन किया जाएगा। पश्चिमी इंजीनियरों की निगरानी में निर्माण होने वाले इस टावर में तीन हज़ार कमरों पर आधारित लगभग तीन भव्य होटल होंगे। इस टावर के निर्माण में तीन अरब डालर का ख़र्चा आएगा और इसमें मौजूद होटल बहुत ही सुन्दर और भव्य होंगे जिनके निकट पूंजीपति और धनवान व्यक्ति के अतिरिक्त कोई दूसरा फटक भी नहीं सकता।
यह शाहख़र्ची इस सीमा तक बढ़ गयी कि सऊदी अरब के पूर्व नरेश की पुत्री बसमा बिन्ते सऊद ने भी इसका विरोध किया है। वह घंटाघर की योजना में एक बड़े घोटाले का रहस्योद्घाटन करती हुई कहती हैं कि मस्जिदुल हराम के विस्तार और विश्व के सबसे बड़े घंटाघर के निर्माण की हालिया परियोजना में चालीस करोड़ डालर का घोटाला हुआ है किन्तु इस समाचार को सेन्सर कर दिया गया, यहां तक कि सऊदी नरेश भी चुप्पी साध गये और उन्होंने इस बारे में एक शब्द भी नहीं कहा। यह चालीस करोड़ डालर जापानी, फ़्रांसीसी, चीनी इत्यादि कंपनियों की जेबों में गये। बसमा सऊदी सरकार द्वारा इस घंटाघर के निर्माण के दूसरे आयामों की ओर संकेत करते हुए कहती हैं कि मक्के की गलियों में यदि हम देखें तो हमें बहुत सरलता से इतने अधिक निर्धन और दरिद्र लोग मिल जाएंगे कि जिनकी संख्यां पर हम विश्वास नहीं कर सकते, उनके पेट भी ख़ाली हैं जबकि हम घंटाघर, महल, विला इत्यादि के निर्माण को जारी रखे हुए हैं।
 सऊदी परिवार के प्रचारों के आधार पर विश्व के सबसे बड़े घंटाघर के निर्माण का औचित्य कि जिसके ऊपरी भाग में 43 बाई 45 मीटर की घड़ी लगी होगी, यह है कि जीएमटी अर्थात ग्रीनविच मीन टाईम के मुक़ाबले में मक्के की घड़ी समय के स्रोत में परिवर्तित हो। जबकि इस कार्य को अंतर्राष्ट्रीय समझौतों के आधार पर होना चाहिए ताकि सभी लोग इसको स्वीकार करें या कम से कम इस्लामी देश ही इसे स्वीकार करें। आले सऊद इस बात पर गर्व कर रहे हैं कि यह घंटाघर रात में 17 किलोमीटर की दूरी से और दिन में 11 किलोमीटर की दूरी से दिखाई देगा किन्तु उन्होंने इस बात का विवरण नहीं दिया कि इस घंटाघर का निर्माण मस्जिदुल हराम में और काबे के निकट ही करना क्यों आवश्यक है और क्या यह मस्जिदुर हराम का अपमान नही है।
 पवित्र स्थलों का विस्तार और उसे सजाना संवारना कभी भी बुरा कार्य नहीं है किन्तु इस शर्त के साथ कि इस्लामी और ऐतिहासिक धरोहर इसके बहाने ध्वस्त न की जाएं और इनका अपमान न किया जाए। मस्जिदुल हराम के भी विस्तार की योजना बन रही है और समय के बीतने के साथ साथ, नई इमारतों के निर्माण व विस्तार के विभिन्न कार्यक्रमों से प्राचीन धरोहर और मोहल्ले समाप्त हो जाएंगे। मस्जिदुल हराम के क्षेत्र में पैग़म्बरे इस्लाम सलल्लाहो अलैह व आलेही वसल्लम के घर, अरक़म नामक गृह जो रसूले इस्लाम के प्रचार का स्थल था, हज़रत अली अलैहिस्सलाम का जीवन स्थल, सयदु शोहदा हज़रत हमज़ा का जन्म स्थल और इस प्रकार के बहुत से पवित्र स्थल जिनमें से प्रत्येक इस्लामी इतिहास को बयान करने वाले और इस्लामी निशानियों में से थे, दिखाई ही नहीं पड़ते।
मदीना नगर की इस्लामी धरोहरें भी आले सऊद और वहाबियों की उपस्थिति के आरंभ से ही ध्वस्त की जाती रही हैं। विध्वंस की सबसे भयानक और सबसे भयावह त्रासदी बक़ीअ नामक क़ब्रिस्तान का ध्वस्त किया जाना थी। जन्नतुल बक़ीअ में पैग़म्बरे इस्लाम के माता पिता, उनके चार पौत्रों और बहुत से साथियों और महापुरुषों के पवित्र पार्थिव शरीर दफ़्न हैं। वर्ष 1926 में वहाबियों ने इस क़ब्रिस्तान को ध्वस्त कर दिया था। वहाबियों ने विभिन्न धरोहरों और गुंबदों को ध्वस्त कर दिया और मूल्यवान चीज़ों को लूट लिया। मदीना नगर के अन्य प्रतीकों में से बनी हाशिम का मोहल्ला था जो मस्जिदुन्नबी के निकट स्थित था, इस पवित्र मोहल्ले का भी अस्तित्व मिटा दिया गया है। यह मोहल्ला पैग़म्बरे इस्लाम सलल्लाहो अलैह व आलेही वसल्लम के प्रिय परिजनों के रहने के स्थान और अध्यात्मिक स्थल के रूप में विभिन्न कालों में सुरक्षित रहा, यहां तक कि इस मोहल्ले के कुछ घरों की मरम्मत भी करायी गयी किन्तु सऊदी अरब पर आले सऊद के वर्चस्व के समय बनी हाशिम का मोहल्ला धीरे धीरे बर्बाद होने लगा यहां तक कि वर्ष 1985 से 1987 तक सऊदी सरकार ने मस्जिदुन्नबी के विस्तार के बहाने इस मोहल्ले की समस्त ऐतिहासिक निशानियों व धरोहरों को पूर्ण रूप से ध्वस्त कर दिया।
 सऊदी अरब से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र ओकाज़ ने भी हालिया दिनों में अपनी रिपोर्ट में धार्मिक और ऐतिहासिक धरोहरों पर सऊदी अधिकारियों की अनदेखी पर आपत्ति जताई। इस समाचार पत्र की रिपोर्ट में हज़रते हमज़ा की मस्जिद की चिंताजनक स्थिति की ओर संकेत किया गया है। यह समाचार पत्र आगे लिखता है कि नगर पालिका ने लोगों के विश्राम के लिए न तो कुर्सियां लगवाई और न ही वृक्ष लगवाए और न ही छायादार छतरी लगवाई, इसी प्रकार ओहद के ऐतिहासिक पर्वत पर चढ़ने के लिए पत्थर की सीढ़ीयां भी नहीं लगाई गयी है। इसके कारण ओहद के पर्वत की ऐतिहासिक निशानियां धीरे धीरे ख़राब हो रही हैं। सऊदी सरकार अपने प्रचारों में यह दिखाने का प्रयास करती है कि वह मस्जिदुल हराम और मस्जिदुन्नबी पर विशेष ध्यान देती है जबकि अन्य धार्मिक और ऐतिहासिक स्थलों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया है। इस संबंध में दूसरा प्रमाण, जबले नूर, ग़ारे हिरा, हज़रत अबूतालिब के क़ब्रिस्तान और अन्य स्थलों की अनदेखी है। पवित्र स्थलों को ध्वस्त करना या उनकी देखभाल न करना इस सीमा तक बढ़ गया है कि लंदन विश्वविद्यालय के अफ़्रीक़ी व पूर्वी धरोहर के संकाय में इस्लामी धरोहर व कला के विशेषज्ञ जेफ़री किंग इस बारे में कहते हैं कि सऊदी अरब में इस्लामी धरोहरों और स्थलों का भविष्य बहुत दुःखद है। इससे संबंधित अधिकारी इन प्राचीन और धार्मिक धरोहरों के ऐतिहासिक मूल्यों और महत्त्व को नहीं जानते इसीलिए वे इसके साथ इस प्रकार का व्यवहार करते हैं।
इस्लाम धर्म के उदय होने के आरंभ से अब तक मुसलमान किसी भी स्थिति में मक्के और मदीने की यात्रा करते हैं और पवित्र स्थलों विशेष ईश्वर के घर काबे के आध्यात्म व प्रकाश से लाभान्वित होते हैं। काबे की ओर जाने वाले समस्त तीर्थयात्रियों का मानना है कि ख़ानए काबा वैभव और विशेष आध्यात्म का स्वामी है और ऊंची ऊंची और भव्य इमारतों का निर्माण, मस्जिदुल हराम के प्रांगड़ में बने इस प्रकाशमयी घर के वैभव को कम नहीं कर सकता क्योंकि यह पवित्र स्थल ईश्वर के आदेश पर ईश्वर के दो महान दूतों हज़रत इब्राहीम व हज़रत इस्माईल के हाथों बना और यह ईश्वरीय संदेश वहि के उतरने का स्थान है। प्रत्येक दशा में सऊदी अरब में कुछ पवित्र स्थलों का ध्वस्त किया जाना जो इस्लाम के इतिहास का सदृश्य व सही दर्पण प्रस्तुत करता है और इसी प्रकार आर्थिक लाभ के लिए निरंकुश निर्माण कार्य जो मक्के और मदीने में पश्चिमी इंजीनियरों और विशेषज्ञों की निगरानी में किया जा रहा है, बहुत अधिक हानि का कारण बना है। इस प्रकार से कि धीरे धीरे मुसलमानों के यह दोनों पवित्र नगर अपनी विदित व इस्लामी पहचान को खोते जा रहे हैं और यूरोपीय वास्तुकला से संपन्न नगरों में परिवर्तित होते जा रहे हैं। इसीलिए विश्व के मुसलमान सऊदी अरब में अपने पवित्र व ऐतिहासिक स्थलों के प्रति चिंतित हैं और उनका यह मानना है कि सऊदी परिवार विश्वासघाती हैं और इन इस्लामी धरोहरों को सुरक्षित रखने के योग्य नहीं हैं

Thursday, 15 August 2013

What Happened to Jannatul Baqi ??!!

Whenever I go to Medina, so many questions come to my mind, “Why is the cemetery where the daughter of the Prophet (pbuh) not built up?  Why is it that my 2nd, 4th, 5th and 6th Imams do not have a zarih and a haram where I can visit them?
When we look at the history of Jannat-ul-Baqi we realize that the cemetery was not always like this.  Umar bin Jubair has described Al-Baqi in his travel diaries as follows:
“Al-Baqi is situated to the east of Medina, … the grave of Ibrahim son of our Prophet (pbuh) with a white dome over it, … a small shrine containing the graves of the Prophet (pbuh)’s wives…. The grave of Hasan bin Ali (a.s.) situated near the gate to its right hand, has an elevated dome over it, … walls are paneled with yellow plates and studded with beautiful star-shaped nails.”
Al-Baqi before destruction
Al-Baqi before destruction
This gives us a completely different picture of Jannat-ul-Baqi, doesn’t it?  So then what happened to these beautiful structures?
Following gives a brief account of what happened:
In 1221 the Wahhabis entered Madina to damage al-Baqi as well as every mosque they came across.  They also tried to demolish the Prophet’s tomb. 
In 1818 the Ottoman rulers reconstructed all the sacred places.
In 1848-1860, further renovations were made by the Ottomans.
In 1924 Wahabis entered Hijaz again. 
In 1925 they destroyed every Islamic heritage except the Prophet’s mosque. 
The date that this destruction of Jannat-ul-Baqi took place is recorded as 8th Shawwal, Wednesday, in the year 1345 AH, April 21, 1925.
Unfortunately, the destruction of Jannat-ul-Baqi continues today.
Several protests have been held over years, several resolutions have been passed, but the destruction has not ceased!
Let aside the destruction, the saddest thing is that one is not even allowed to stand by the cemetery and pay his/her respects to the holy personalities in peace.
It is so heartbreaking that Sayyada Fatema (a.s.), and our Imams were tormented during their lifetime and are still being agonized.
Let’s pray to Allah to hasten the appearance of our Imam (a.s.) so we can stop this anguish and pain!
Jannat-ul-Baqi at present
Jannat-ul-Baqi at present
Ref: History of the Cemetery of Jannat Al-Baqi, www.al-islam.org/shrines/baqi.htm
www.ezsoftech.com/islamic/baqi.asp

JANNAT-UL-BAQII’ – The Graveyard that Shook the Saudi Dynasty

Demolition of Jannat-ul-Baqi’: Saudi dynasty digs its own grave
Jannat-ul-Baqi’ is a much revered graveyard located in Madinah Munawwarah in Saudi Arabia. Many great personalities of the Ahle Bait (a.s.), immaculate members of his (s.a.w.a.) household including his (s.a.w.a.) successors are laid to rest here:
  1. Hazrat Fatemah al-Zahra (a.s.), the Prophet’s (s.a.w.a.) highly-revered daughter
  2. Imam Hasan b. Ali – Al Mujtaba (a.s.)
  3. Imam Ali b. Husain – Zain al-Aabedeen (a.s.)
  4. Imam Muhammad b. Ali – Al-Baqir (a.s.) and
  5. Imam Jafar b. Muhammad – Al-Sadiq (a.s.)
In addition to the successors of the Messenger (s.a.w.a.), prominent and famous companions of the Prophet (s.a.w.a.) and his (s.a.w.a.) close relatives are also buried here:
  1. Abbas b. Abdul Muttalib (Prophet’s (s.a.w.a.) uncle)
  2. Safiyyah bint Abdil Muttallib and Aatika bint Abdil Muttalib (Prophet’s aunts (s.a.w.a.))
  3. Ibrahim b. Muhammad (Prophet’s (s.a.w.a.) son)
  4. Hazrat Fatima binte Asad (Prophet’s (s.a.w.a.) aunt and Ameerul Momineen’s (a.s.) mother (a.s.))
  5. Aqeel b. Abi Talib (Prophet’s (s.a.w.a.) cousin and Ameerul Momineen’s (a.s.) brother)
  6. Muhammad b. Ali b. Abi Taalib, famous as Muhammad-e-Hanafiyyah (his mother’s name was Hanafiyyah)
  7. Hazrat Ummul Baneen (mother of Hazrat Abul Fazl Abbas b. Ali b. Abi Taalib (a.s.))
  8. Ismail b. Imam Sadiq (a.s.)
  9. Abdullah b. Jafar-e-Tayyaar (a.s.)
These are the individuals buried in Baqi’ and their graves were adorned with mausoleums and tombs. Even today Muslims have preserved pictures of the tombs and these are widely available on internet websites. These tombs were present till 8th Shavval 1344 A.H. Apart from these great personalities, graves of approximately seven thousand famous companions are located in Baqi’. Similarly, many scholars of the early days of Islam are also buried here, like Imam Maalik – the founder of the Maaliki sect. Like with other graves, a tomb was also built over his grave.
The first attack on Baqi’ – 1220 A.H.
The attack was first engineered by the Wahhabis in 1220 A.H. i.e. when the first Saudi government was overthrown by the Ottoman government. In 1220 A.H. Wahhabis entered Medinah to demolish Baqi’ and tried to demolish many mosques instead of Baqi’. They initially tried to pull down the dome of the mausoleum of the Prophet (s.a.w.a.) but apparently refrained due to fear of reprisal.
The Ottoman government renovated the mausoleums and Shias and Sunnis from all over the world accumulated funds for its renovation. Consequently, beautiful tombs were created in Baqi’ and visitors from all over the world at the time of Hajj, Umrah and Ziyaarah paid their respects to these tombs.
However, this was just the beginning of the nightmare for the Islamic world.
The Day of Demolition
The Day of Demolition as it came to be known later was the day of breaking down of all mausoleums and tombs in Baqi’.
In 1344 A.H. when Aal-e-Saud – Saudi family gained complete control of Makkah, Madinah and its neighborhood, they decided to wipe out the signs of the holy places, Jannatul Baqi’, companions and family of the Prophet (s.a.w.a.) from the map of Islam. For this, they obtained rulings from the scholars of Madinah to make it easy for themselves and to gain support of the people of Hijaz who were previously not ready for their rule.
Rulings for Demolition

Wednesday, 5 June 2013

सऊदी सरकार और वहाबी कठमुल्ला इस्लामी प्रतीकों को तबाह कर रहे हैं।

इतिहास केवल इतिहासकारों द्वारा लिखी गयीं वस्तुओं तक सीमित नहीं है बल्कि हर देश और हर राष्ट्र के जीवित व सदृश्य इतिहास को ऐतिहासिक इमारतों में भी देखा जा सकता है। इमारतें व धरोहर, प्राचीन क़ब्रिस्तान, हज़ारों वर्ष पुराने गुंबद और स्तंभ भी लिखित इतिहास की भांति मनुष्यों को इतिहास की गाथाएं सुनाते हैं और हर स्थान और देश की सांस्कृतिक, राजनैतिक और सामाजिक पहचान का चित्रण करते हैं। कुछ समय से सऊदी अरब में इस्लाम का जीवित व सदृश्य इतिहास जो ईश्वरीय धर्म इस्लाम की महा सांस्कृतिक धरोहर समझा जाता है, बर्बाद हो रहा है और सऊदी सरकार तथा वहाबी कठमुल्ला, मुसलमानों को इन ऐतिहासिक धरोहरों से वंचित कर रहे हैं। बहुत से लोगों का मानना है कि सऊदी अरब के अधिकारी मक्के और मदीने में तीर्थयात्रियों की गुंजाइश बढ़ाने के उद्देश्य से मस्जिदुन्नबी और मस्जिदुल हराम को विस्तृत करने की योजना का क्रियान्वयन कर रहे हैं और यह अधिकारी इन पवित्र स्थलों के अध्यात्मिक आयामों का ध्यान नहीं रख रहे हैं। लेबनान के दावते इस्लामी कालेज के प्रमुख शैख़ अब्दुन्नासिर अलजबरी ने इस संबंध में अलआलम टीवी चैनल से बात करते हुए कहा कि जब हम पवित्र नगर मदीने में पैग़म्बरे इस्लाम सलल्लाहो अलैह व आलेही वसल्लम के रौज़े का दर्शन करते हैं तो हम देखते हैं कि खोखले कार्टूनों की भांति लंबी लंबी इमारतों से रौज़े को घेर दिया गया है और अपार अध्यात्मिक गुणों से संपन्न उन पवित्र स्थलों के अस्तित्व को मिटा दिया गया है जिनके माध्यम से हम पैग़म्बरे इस्लाम सलल्लाहो अलैह व आलेही वसल्लम के पवित्र चरित्र और व्यवहार तथा पवित्र क़ुरआन की आयतों को प्राप्त कर सकते हैं।
 वहाबियों वाली आस्था रखने वाली सऊदी अरब की सरकार ने अपने गठन के आरंभ से ही विभिन्न बहानों से धार्मिक स्थलों की पवित्रता की अनदेखी की है। बहाबियों ने धर्म में नयी बातों के प्रविष्ट होने और अंधविश्वास से संघर्ष के बहाने अब तक पवित्र नगर मक्के और मदीने नगर में बहुत सी ऐतिहासिक और धार्मिक धरोहरों को बर्बाद किया है। इस्लामी धरोहरों के विशेषज्ञ सामी ओजावी का मानना है कि कुछ समय बाद मक्के में प्राचीन इतिहास का कोई भी धरोहर दिखाई नहीं पड़ेगी। हालिया 50 वर्षो के दौरान मक्के और मदीने में वहाबी कठ्मुल्लाओं द्वारा 300 से अधिक धार्मिक और ऐतिहासिक इमारतों को ध्वस्त किया जा चुका है। इन धरोहरों को बर्बाद करने वाले पैग़म्बरे इस्लाम सलल्लाहो अलैह व आलेही वसल्लम से संबंधित धरोहरों को मिटाने में भीसंकोच नहीं करते। धर्मभ्रष्ट वहाबी कठ्मुल्लाओं का मानना है कि यदि यह इमारतें बाक़ी रहीं तो संभव है कि दूसरे देशों के मुसलमानों द्वारा इनका सम्मान किया जाने लगे और यह कार्य उनकी दृष्टि में मूर्तिपूजा और ईश्वर के अतिरिक्ति किसी और की उपासना करने के समान है। जबकि यह केवल एक धर्मोंमादी गुट अर्थात वहाबियों की आस्था है और मुसलमान अपना यह दायित्व समझते हैं कि वह अपने प्यारे पैग़म्बर और अन्य हस्तियों का जिन्होंने इस्लाम धर्म को आगे बढ़ाने और स्थापित करने के लिए बहुत कठिनाईयां सहन कीं और अध्यात्म के श्रेष्ठ स्थानों पर हैं, सम्मान करें। सऊद परिवार की सरकार ने जहां भी पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम और उनके प्रिय परिजनों और उनके साथियों से संबंधित कोई भी ऐतिहासिक धरोहर बच गये और वह घर जो पैग़म्बरे इस्लाम और उनके प्रिय परिजनों के साधारण और अध्यात्म से पूर्ण जीवन की निशानी थे, सभी को अतार्किक और निराधार बहानों से ध्वस्त कर दिया।
 शीया और सुन्नी दोनों ही समुदायों ने बहुत से इस्लामी इतिहासों का हवाला दिया है जिनके आधार पर ईश्वर के पवित्र घर काबे के सम्मान और उसके वैभव की रक्षा के लिए मस्जिदुल हराम के ईर्द गिर्द उससे ऊंची इमारतों का निर्माण अवैध है। कुछ वर्षों पूर्व तक मस्जिदुल हराम के प्रांगड़ से मिली हुई बड़ी इमारत सऊदी अरब के पूर्व नरेश मलिक फ़हद का महल था किन्तु हालिया दिनों में सऊदी परिवार ने और भी लंबा पैर फैला दिया है और वह मस्जिदुल हराम के निकट घंटाघर या क्लाक टावर के नाम से सबसे ऊंची इमारत का उद्धाटन करने वाले हैं। इस टावर के ऊपरी भाग में घड़ी लगी होगी और छोटे छोटे टावर उसके इर्द गिर्द बने होंगे। 11 जनवरी वर्ष 2012 को इसका उद्घाटन किया जाएगा। पश्चिमी इंजीनियरों की निगरानी में निर्माण होने वाले इस टावर में तीन हज़ार कमरों पर आधारित लगभग तीन भव्य होटल होंगे। इस टावर के निर्माण में तीन अरब डालर का ख़र्चा आएगा और इसमें मौजूद होटल बहुत ही सुन्दर और भव्य होंगे जिनके निकट पूंजीपति और धनवान व्यक्ति के अतिरिक्त कोई दूसरा फटक भी नहीं सकता।
यह शाहख़र्ची इस सीमा तक बढ़ गयी कि सऊदी अरब के पूर्व नरेश की पुत्री बसमा बिन्ते सऊद ने भी इसका विरोध किया। वह घंटाघर की योजना में एक बड़े घोटाले का रहस्योद्घाटन करती हुई कहती हैं कि मस्जिदुल हराम के विस्तार और विश्व के सबसे बड़े घंटाघर अर्थात क्लाक टावर के निर्माण की हालिया परियोजना में चालीस करोड़ डालर का घोटाला हुआ है किन्तु इस समाचार को सेन्सर कर दिया गया, यहां तक कि सऊदी नरेश भी चुप्पी साध गये और उन्होंने इस बारे में एक शब्द भी नहीं कहा। यह चालीस करोड़ डालर जापानी, फ़्रांसीसी, चीनी इत्यादि कंपनियों की जेबों में गये। बसमा सऊदी सरकार द्वारा इस घंटाघर के निर्माण के दूसरे आयामों की ओर संकेत करते हुए कहती हैं कि मक्के की गलियों में यदि हम देखें तो हमें बहुत सरलता से इतने अधिक निर्धन और दरिद्र लोग मिल जाएंगे कि जिनकी संख्यां पर हम विश्वास नहीं कर सकते, उनके पेट भी ख़ाली हैं जबकि हम घंटाघर, महल, विला इत्यादि के निर्माण को जारी रखे हुए हैं।
 सऊदी परिवार के प्रचारों के आधार पर विश्व के सबसे बड़े घंटाघर के निर्माण का औचित्य कि जिसके ऊपरी भाग में 43 बाई 45 मीटर की घड़ी लगी होगी, यह है कि जीएमटी अर्थात ग्रीनविच मीन टाईम के मुक़ाबले में मक्के की घड़ी समय के स्रोत में परिवर्तित हो। जबकि इस कार्य को अंतर्राष्ट्रीय समझौतों के आधार पर होना चाहिए ताकि सभी लोग इसको स्वीकार करें या कम से कम इस्लामी देश ही इसे स्वीकार करें। आले सऊद इस बात पर गर्व कर रहे हैं कि यह घंटाघर रात में 17 किलोमीटर की दूरी से और दिन में 11 किलोमीटर की दूरी से दिखाई देगा किन्तु उन्होंने इस बात का विवरण नहीं दिया कि इस घंटाघर का निर्माण मस्जिदुल हराम में और काबे के निकट ही करना क्यों आवश्यक है।
 पवित्र स्थलों का विस्तार और उसे सजाना संवारना कभी भी बुरा कार्य नहीं है किन्तु इस शर्त के साथ कि इस्लामी और ऐतिहासिक धरोहर इसके बहाने ध्वस्त न की जाएं और इनका अपमान न किया जाए। मस्जिदुल हराम के भी विस्तार की योजना बन रही है और समय के बीतने के साथ साथ, नई इमारतों के निर्माण व विस्तार के विभिन्न कार्यक्रमों से प्राचीन धरोहर और मोहल्ले समाप्त हो जाएंगे। मस्जिदुल हराम के क्षेत्र में पैग़म्बरे इस्लाम सलल्लाहो अलैह व आलेही वसल्लम के घर, अरक़म नामक गृह जो रसूले इस्लाम के प्रचार का स्थल था, हज़रत अली अलैहिस्सलाम का जीवन स्थल, सयदु शोहदा हज़रत हमज़ा का जन्म स्थल और इस प्रकार के बहुत से पवित्र स्थल जिनमें से प्रत्येक इस्लामी इतिहास को बयान करने वाले और इस्लामी निशानियों में से थे, दिखाई ही नहीं पड़ते।
मदीना नगर की इस्लामी धरोहरें भी आले सऊद और वहाबियों की उपस्थिति के आरंभ से ही ध्वस्त की जाती रही हैं। विध्वंस की सबसे भयानक और सबसे भयावह त्रासदी बक़ीअ नामक क़ब्रिस्तान का ध्वस्त किया जाना थी। जन्नतुल बक़ीअ में पैग़म्बरे इस्लाम के माता पिता, उनके चार पौत्रों और बहुत से साथियों और महापुरुषों के पवित्र पार्थिव शरीर दफ़्न हैं। वर्ष 1926 में वहाबियों ने इस क़ब्रिस्तान को ध्वस्त कर दिया था। वहाबियों ने विभिन्न धरोहरों और गुंबदों को ध्वस्त कर दिया और मूल्यवान चीज़ों को लूट लिया। मदीना नगर के अन्य प्रतीकों में से बनी हाशिम का मोहल्ला था जो मस्जिदुन्नबी के निकट स्थित था, इस पवित्र मोहल्ले का भी अस्तित्व मिटा दिया गया है। यह मोहल्ला पैग़म्बरे इस्लाम सलल्लाहो अलैह व आलेही वसल्लम के प्रिय परिजनों के रहने के स्थान और अध्यात्मिक स्थल के रूप में विभिन्न कालों में सुरक्षित रहा, यहां तक कि इस मोहल्ले के कुछ घरों की मरम्मत भी करायी गयी किन्तु सऊदी अरब पर आले सऊद के वर्चस्व के समय बनी हाशिम का मोहल्ला धीरे धीरे बर्बाद होने लगा यहां तक कि वर्ष 1985 से 1987 तक सऊदी सरकार ने मस्जिदुन्नबी के विस्तार के बहाने इस मोहल्ले की समस्त ऐतिहासिक निशानियों व धरोहरों को पूर्ण रूप से ध्वस्त कर दिया।
 सऊदी अरब से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र ओकाज़ ने भी हालिया दिनों में अपनी रिपोर्ट में धार्मिक और ऐतिहासिक धरोहरों पर सऊदी अधिकारियों की अनदेखी पर आपत्ति जताई। इस समाचार पत्र की रिपोर्ट में हज़रते हमज़ा की मस्जिद की चिंताजनक स्थिति की ओर संकेत किया गया है। यह समाचार पत्र आगे लिखता है कि नगर पालिका ने लोगों के विश्राम के लिए न तो कुर्सियां लगवाई और न ही वृक्ष लगवाए और न ही छायादार छतरी लगवाई, इसी प्रकार ओहद के ऐतिहासिक पर्वत पर चढ़ने के लिए पत्थर की सीढ़ीयां भी नहीं लगाई गयी है। इसके कारण ओहद के पर्वत की ऐतिहासिक निशानियां धीरे धीरे ख़राब हो रही हैं। सऊदी सरकार अपने प्रचारों में यह दिखाने का प्रयास करती है कि वह मस्जिदुल हराम और मस्जिदुन्नबी पर विशेष ध्यान देती है जबकि अन्य धार्मिक और ऐतिहासिक स्थलों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया है। इस संबंध में दूसरा प्रमाण, जबले नूर, ग़ारे हिरा, हज़रत अबूतालिब के क़ब्रिस्तान और अन्य स्थलों की अनदेखी है। पवित्र स्थलों को ध्वस्त करना या उनकी देखभाल न करना इस सीमा तक बढ़ गया है कि लंदन विश्वविद्यालय के अफ़्रीक़ी व पूर्वी धरोहर के संकाय में इस्लामी धरोहर व कला के विशेषज्ञ जेफ़री किंग इस बारे में कहते हैं कि सऊदी अरब में इस्लामी धरोहरों और स्थलों का भविष्य बहुत दुःखद है। इससे संबंधित अधिकारी इन प्राचीन और धार्मिक धरोहरों के ऐतिहासिक मूल्यों और महत्त्व को नहीं जानते इसीलिए वे इसके साथ इस प्रकार का व्यवहार करते हैं।
इस्लाम धर्म के उदय होने के आरंभ से अब तक मुसलमान किसी भी स्थिति में मक्के और मदीने की यात्रा करते हैं और पवित्र स्थलों विशेष ईश्वर के घर काबे के आध्यात्म व प्रकाश से लाभान्वित होते हैं। काबे की ओर जाने वाले समस्त तीर्थयात्रियों का मानना है कि ख़ानए काबा वैभव और विशेष आध्यात्म का स्वामी है और ऊंची ऊंची और भव्य इमारतों का निर्माण, मस्जिदुल हराम के प्रांगड़ में बने इस प्रकाशमयी घर के वैभव को कम नहीं कर सकता क्योंकि यह पवित्र स्थल ईश्वर के आदेश पर ईश्वर के दो महान दूतों हज़रत इब्राहीम व हज़रत इस्माईल के हाथों बना और यह ईश्वरीय संदेश वहि के उतरने का स्थान है। प्रत्येक दशा में सऊदी अरब में कुछ पवित्र स्थलों का ध्वस्त किया जाना जो इस्लाम के इतिहास का सदृश्य व सही दर्पण प्रस्तुत करता है और इसी प्रकार आर्थिक लाभ के लिए निरंकुश निर्माण कार्य जो मक्के और मदीने में पश्चिमी इंजीनियरों और विशेषज्ञों की निगरानी में किया जा रहा है, बहुत अधिक हानि का कारण बना है। इस प्रकार से कि धीरे धीरे मुसलमानों के यह दोनों पवित्र नगर अपनी विदित व इस्लामी पहचान को खोते जा रहे हैं और यूरोपीय वास्तुकला से संपन्न नगरों में परिवर्तित होते जा रहे हैं। इसीलिए विश्व के मुसलमान सऊदी अरब में अपने पवित्र व ऐतिहासिक स्थलों के प्रति चिंतित हैं और उनका यह मानना है कि सऊदी परिवार विश्वासघाती हैं और इन इस्लामी धरोहरों को सुरक्षित रखने के योग्य नहीं हैं।

Monday, 3 June 2013

A Short Documentary of Jannatul Baqi and its Destruction by Aale Saud - Video


A short documentary about the situation of Jannat ul Baqi and destruction of other Holy Places in Madina and role of Al Saud.

Thursday, 30 May 2013

Aale-Saud Parrots in Jannatul Baqi

These are Saudi Govt. Parrots who are trained to abuse the Lover of Aale Mohammad(s.a.wa.)

Muslims must avoid any conversations with these idiots as they are there to distract the muslims from doing the Ziyarat of Graves of Progeny of Prophet(s.a.w.a).
They stand and challenge the common people who have come there to do ziyarat to prove that the ziyarat of Graves are correct.
These idiots should understand that the answers to all the nonsense questions tossed by these people are already answered by Shia and Sunni Scholars.
They fooled the people in making them believe that their visiting the graves is unislamic acts and a capital sin.
 
Our Muslims Brothers should take care of the following things when they visit the Graves in Jannatul Baqi.

1) Avoid all types of conversations and debates with these people.

2) Concentrate on the Ziyarat of Graves and dont allow them to arouse you with their vain talk.

3) Tell them that this is not a place for debate where you are talking to common people and they cannot confront you due to security reasons.

4) If you talk anything against their belief, they may imprison you or fake a case against you that you have spoken something ,which is against Prophet(s.a.w.a) OR Allah

5) Keep in mind that you are away from your home and these Saudi Parrots are secured by their Government.

6) Avoid carrying Books of Ziyarat because these Parrots dont have respect for grave then how can you expect them to respect the books of Ziyarat.

7) Even if are angry when they abuse the father,grandfather and great grandfather of Holy Prophet(sawa) by calling them Kafir, restrain yourself and curse them silently.

8) Dont worry if you are unable to answer their questions. When you come home ask your religious scholar they will give you satisfactory answer, Inshallah.

9)Remember when SAFA and MARWA are the signs of Allah then how can these Graves be not the Signs of Allah, as looking at them fill us with Love of ALLAH and His Prophet(SAWA).

There are so many answers available, which could be given to these NAJDI Scholars but History bear witness that they rejected all the sound reasoning given by our scholars.

Wahabi Clerics now want to demolise the tomb of Prophet Muhammad(s.a.w.a)


Tomb of Holy Prophet Muhammad (s.a.w.a)
 The war imposed on Syria has grown to a full-scale world war practically with all major Arab powers and western imperialist regimes supporting wahhabi militant groups in order to topple the Asad regime . Asad regime is unpopular with Arabs Sheikhdoms and western powers due to its strong resistance to Zionist entity.
 In one camp are US,UK,Israel,Turkey,Qatar,Saudi Arabia,Jordan and Bahraini regimes as one leading english daily observes in their editorial last week and in the other is Hezbollaah and Islamic Iran  .

Only recently a wahhabi cleric legalized through a religious decree  the raping of syrian muslim women by the wahhabi takfiri militia members . Syria ,demographically consists of a significant number of Sunni muslims ,often claimed to be a Sunni majority country .

Of course wahhabi groups have a long history of desecration starting from the heinous acts of Aal-e-Saud which razed to ground hundreds of graves of revered companions in Jannat ul Baqi and in the other parts of Holy lands ever since their invasion of the muslim Qibla .[Direction of prayers.]

Wahhabi ism primarily was conceived as a consequence of a najis union of Aal-e-Saud, Aal-e-Sheikh ,British imperialism and Zionism and has slaughtered hundreds of thousands of moderate Sunni muslims ever since and an equally significant number of Shias too . The ideology is infamous for always dancing to the tunes of global arrogance ever since it was formed and some how its stance always colludes with the interest of imperial powers .Some analysts however term it mere coincidence that in last 2 and a half centuries or so ,some how their official line was always the one that favoured imperialism.

In Iraq , lately they bombed shrines of Samarra revered by Shia and Sunni muslims of the 10th and 11th Sons in the Progeny of Hazrat Muhammad SAWW  - Imam Naqi-al Hadi and Imam Hasan al-Askari. [Alaihimussalam].
Since the beginning of the armaggedonic war in Syria , many sacred sites came under attack . Shrine of Sayyida Sakina Bintal Hussain Ibn Ali has also come under strong disruption . The wahhabi takfiri groups also recently announced to attack the Shrine of Sayyida Zainab Salaamullaah Alaiha [  the grand daughter of Rasool-e-Khuda SAWW ] .

More alarming however is the fact that wahhabi clerics are becoming increasingly vocal on different arab televisions regarding the grave of Rasool-e-Khuda [SAWW] emphasizing that the tomb and everything was built later and its a bid'ah . This must not be taken lightly by muslims .

Now it is becoming increasingly clear as to why we saw a series of blasphemies like the carricature and other things ,that is to desensitize the muslim masses to the point ,that slowly one after the other the wahhabi beasts will ultimately be looking towards achieving the last filthiest wish of kuffaar which is to raze the grave of the last Prophet [SAWW] .

Shia and Sunni muslims must remain fully alive to the situation and isolate the najis ideology of takfiri wahhabis as a moment' s slackness might [God forbid] give us regret of centuries otherwise.  This evil ideology must be buried once and for ever as they have declared a war on Islam .

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