Jannatul Baqi is a cemetery in Medina, Saudi Arabia, located to the southeast of the Masjid al-Nabawi.On 1 May 1925, the mausoleums in al-Baqi' were destroyed by King Ibn Saud. This happened despite protests by the international Islamic community.
Jannatul Baqi Map
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Thursday, 13 June 2019
Demolition of Jannatul Baqee.pdf
Jannatul Baqi
A Symbol of Continued Oppression
Jannatul Baqi is a much-esteemed graveyard located in Al-Madinah al Munawwarah in Saudi Arabia. Many of the great companions of the Messenger (s.a.w.a.) and immaculate members of his (s.a.w.a.) household including his (s.a.w.a.) successors are laid to rest here.
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Monday, 2 July 2018
Thursday, 13 April 2017
Wednesday, 6 November 2013
जन्नतुल बक़ीअ कि तबाही अफ़सोस!
अफ़सोस!
बीती हुई सदी में 44 हिजरी 8 शव्वालुलमुकर्रम को आले सऊद ने बनी उमय्या व
बनी अब्बास के क़दम से क़दम मिलाते हुए ख़ानदाने नबुव्वत व इसमत के लाल व
गोहर की क़ब्रों को वीरान करके अपनी दुश्मनी का सबूत दिया जो सदियों से
उसके सीनों में थी। आज आले मुहम्मद की क़ब्रें बे छत व दीवार हैं जबकि उनके
सदके़ में मिलने वाली नेमतों से ये यहूदी नुमा सऊदी अपने महलों में मज़े
उड़ा रहे हैं। इस चोरी के बाद सीना ज़ोरी का यह आलम है कि चंद ज़मीर व क़लम
फ़रोश मुफ़ती अपने बे बुनियाद फ़त्वों की असास इन झूटी रिवायात को क़रार
देते हैं जो बनी उमय्या और शाम के टकसाल में बनी,बिकी और ख़रीदी गई हैं
‘‘हसबोना किताबल्लाह’’ की दावेदार क़ौम आज क़ुरआन के खुले अहकाम को छोड़ कर
अपनी काली करतूतों का जवाज़ नक़ली हदीसों के आग़ोश में तलाश कर रही है।
सितम
बालाये सितम ये कि उनके मुक़द्दस मज़ारों को तोड़ने के बाद अब इस ममलेकत
से छपने वाली किताबों में, बक़ीअ में दफ़न उन बुज़ुर्गाने इस्लाम के नाम का
भी जि़क्र नहीं होता, मुबादा कोई यह न पूछ ले कि फिर उनके रौज़े कहाँ गये।
सऊदी अरब में वज़ारते इस्लामीः
उमूर औक़ाफ़ व दावत व इर्शाद की जानिब से हुज्जाजे किराम के लिये छपने और
उनके दरमियान मुफ़्त तक़सीम होने वाले किताबचे ‘‘रहनुमाए हज व उमरा व
ज़्यारते मस्जिदे नबवी’’ (मुसन्निफ़: मुतअद्दि उलमाए किराम, उर्दू तर्जुमा
शेख़ मुहम्मद लुक़मान सलफ़ी1419हि0) की इबारत मुलाहज़ा होः
‘‘अहले
बक़ीअः हज़रत उसमान, शोहदाए ओहद और हज़रत हमज़ा रज़ी अल्लाहु अन्हुम की
क़ब्रों की ज़्यारत भी मसनून है... मदीना मुनव्वर में कोई दूसरी जगह या
मस्जिद नहीं है कि जिसकी ज़्यारत जाइज़ हो इसलिये अपने आपको तकलीफ़ में न
डालो और न ही कोई ऐसा काम करो जिसका कोई अज्र न मिले बल्कि उलटा गुनाह का
ख़तरा है।’’
यानी
इस किताब के लिखने वाले ‘‘उलमा’’ की निगाह में बक़ीअ में जनाबे
उसमान,शोहदाए ओहद और हज़रत हमज़ा की क़ब्रों के अलावा कोई और ज़्यारत गाह
नहीं है जबकि तारीख़े इस्लाम को पढ़ने वाला एक मामूली तालिबे इल्म भी यह
बात बख़ूबी जानता है कि इस क़ब्रिस्तान में आसमाने इल्म व इरफ़ान के ऐसे
आफ़ताब व माहताब दफ़न हैं जिनके नूर से आज तक कायनात मुनव्वर व रौशन है।
अब
ऐसे वक़्त में जबकि वहाबी मीडिया यह कोशिश कर रही है कि जन्नतुल बक़ीअ में
मदफ़ून, यज़दगाने इस्लाम के नाम को भी मिटाया जाये, ज़रूरी है कि तमाम
मुसलमानों की खि़दमत में मज़लूमों का तज़केरा किया जाये ताकि दुश्मन आनी
साजि़श में कामियाब न होने पाये, नीज़ यह भी वाज़ेह हो जाये कि इस्लाम की
वह कौन सी मायानाज़ इफ़तिख़ार हस्तियाँ हैं जिनके मज़ार को वहाबियों की कम
अक़ली व कज रवी ने वीरान कर दिया है लेकिन इस गुफ़त्गू से क़ब्ल एक बात
क़ाबिले जि़क्र है कि यह क़ब्रिस्तान पहले एक बाग़ था, अरबी ज़बान में इस
जगह का नाम ‘‘अलबक़ीअ अलग़रक़द’’ है, बक़ीअ यानी मुख़तलिफ़ दरख़्तों का
बाग़ और ग़रक़द एक मख़सूस कि़स्म के दरख़्त का नाम है चूंकि इस बाग़ में एक
तरह के दरख़्त ज़्यादा थे इस वजह से इसे बक़ीअ ग़रक़द कहते थे, इस बाग़
में चारों तरफ़ लोगों के घर थे जिनमें से एक घर जनाब अबुतालिब के फ़रज़न्दे
अक़ील का भी था जिसे ‘‘दारे अक़ील’’ कहते थे, बाद में जब लोगों ने अपने
मरहूमीन को इस बाग़ में अपने घरों के अन्दर दफ़न करना शुरू किया तो ‘‘दारे
अक़ील’’ पैग़म्बरे इस्लाम स॰ के ख़ानदान का क़ब्रिस्तान बना और मक़बरा
‘‘बनी हाशिम’’ कहलाया। रफ़ता रफ़ता पूरे बाग़ से दरख़्त कटते गये और
क़ब्रिस्तान बनता गया।
Friday, 7 June 2013
A touching Documentary on Jannatul Baqi
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